मुसलमानों को अलग- अलग हिस्सों में बांटने की साजिश रच रहा है इजराइल

मुसलमानों को अलग- अलग हिस्सों में बांटने की साजिश रच रहा है इजराइल

इस्राईल के प्रधानमंत्री बिनयामिन नेतनयाहू बहुत ख़ुश दिखाई दे रहे हैं। उनकी ख़ुशी की वजह अफ़्रीक़ी देश चाड से इस्राईल के संबंधों का विस्तार है। नेतनयाहू का कहना है कि उनकी चाड यात्रा ऐतिहासिक घटना है।

उनका कहना था कि चाड एक बड़ा इस्लामी देश है और इस देश से इस्रामल के संबंधों का मतलब यह है कि इस्लामी और अरब जगत में जो क्रान्ति शुरू हुई है वह लगातार आगे बढ़ रही है।

नेतनयाहू ने इस अवसर पर ईरान और फिलिस्तीन को याद किया। उन्होंने कहा कि उनकी यह यात्रा ईरान और फ़िलिस्तीनियों को बहुत बुरी लगेगी लेकिन वह इस निकटता का रास्ता रोक नहीं पाएंगे।

वैसे यह बात सही है कि चाड से इस्राईल की निकटता पर फ़ार्स खाड़ी के अरब देशों को भी बुरा नहीं लगेगा न ही फ़िलिस्तीनी प्रशासन को यह चीज़ बुरी लगेगी और न ही जार्डन और मिस्र इस पर कुछ कहेंगे क्योंकि मिस्र, जार्डन और फ़िलिस्तीनी प्रशासन को ख़ुद ही इस्राईल से संबंध स्थापित कर चुके हैं। यह देश तो चाड से इस्राईल की रिश्तों पर ख़ुश होंगे और अन्य अफ़्रीक़ी देशों को भी प्रोत्साहित करेंगे कि वह इस्राईल से संबंध बढ़ाएं।

एक ज़माना था जब अरब देशों की ओर से इस्राईल की गतिविधियों पर नज़र रखी जाती थी और अफ़्रीक़ा में इस्राईल की किसी भी आर्थिक अथवा राजनैतिक सेंध लगाने की कोशिश को नाकाम बना दिया जाता था।

अरब देश अफ़्रीक़ा के अलावा दूसरे इलाक़ों में भी इस्राईल के रिश्तों का रास्ता रोक दिया करते थे। मगर वह ज़माना अब बीत चुका है क्योंकि वह अरब नेता बचे ही नहीं जो फ़िलिस्तीन के प्रति वफ़ादार थे और इस्लामी जगत के हितों के बारे में सोचते थे।

अरब देशों, विशेष रूप से धनवान अरब देशों ने अफ़्रीक़ा महाद्वीप को पूरी तरह उसके हाल पर छोड़ दिया और उन देशों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया जो अरब जगत के मुद्दों पर हमेशा साथ देते थे। अब यह धनवान देश इस कोशिश में लगे रहते हैं कि इस्राईल से उनके गुप्त सुरक्षा व सामरिक संबंध स्थापित हों।

उनके मन में हमेशा ईरान रहता है जिसे वह अकारण ही अपने लिए ख़तरा समझते हैं। जब यह स्थिति है तो चाड के राष्ट्रपति इदरीस दीबी की तेल अबीब यात्रा पर हमें आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए और इसके जवाब में इस्राईली प्रधानमंत्री की चाड यात्रा में भी कोई हैरत वाली बात नहीं है।

अफ़्रीक़ी देशों ने तो जब भी अरब जगत के प्रमुख मुद्दों की बात आई तो उन्होंने बढ़ चढ़ कर साथ दिया मगर धनवान अरब व इस्लामी देशों ने इन अफ़्रीक़ी देशों पर कब कोई ध्यान दिया? हालांकि यह अफ़्रीक़ी देश वह हैं जिन्होंने अमरीका, फ़्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों की नाराज़गी भी मोल ली मगर इस्राईल से संबंध स्थापित करना स्वीकार नहीं किया।

पश्चिमी देशों ने उन सभी देशों को एक एक करके निशाना बनाया और निशाना बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो इस्राईल के अस्तित्व के विरोधी हैं और दुख की बात तो यह है कि इसमें कुछ इस्लामी व अरब देश भी पश्चिमी देशों का साथ दे रहे हैं। लीबिया पर हमला करने वाले देशों को देखिए इनमें कई अरब और मुस्लिम देश नज़र आ जाएंगे।

इसी तरह ईरान के ख़िलाफ जारी प्रोपैगंडे और साज़िशों में शामिल देशों को देखिए तो उनमें अरब और इस्लामी देश बहुत आसानी से नज़र आ जाएंगे। सीरिया के ख़िलाफ़ साज़िश रचने वाले देशों में भी इस्लामी और अरब देश आगे आगे नज़र आएंगे।

साभार- ‘parstoday.com’



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