दुनिया में फैल रही नफ़रत से यहूदी परेशान, क्या है वज़ह?

दुनिया में फैल रही नफ़रत से यहूदी परेशान, क्या है वज़ह?

यहूदी जनसंहार देखने वाले इतिहासकार जाउल फ्रीडलैंडर ने जर्मन सदन को संबोधित करते हुए दक्षिणपंथी और वामपंथी कट्टरपंथियों को आड़े हाथों लिया. उन्होंने दोनों धड़ों को यहूदियों के प्रति घृणा फैलाने का जिम्मेदार ठहाराया.

जर्मन संसद बुंडेसटाग में नाजी काल के पीड़ितों की स्मृति में हर साल एक वार्षिक सत्र होता है. इस बार इस्राएल के इतिहासकार और हिटलर की तानाशाही के दौरान यहूदी जनसंहार (होलोकॉस्ट) के गवाह रहे जाउल फ्रीडलैंडर ने सत्र को संबोधित किया.

उनका भाषण सोचने पर मजबूर करने वाला था. उन्हें सुनने के लिए जर्मन राष्ट्रपति फ्रांक वाल्टर श्टाइनमायर और चांसलर अंगेला मैर्केल जैसे मेहमानों वाला सदन पूरी तरह भरा था.

86 साल के फ्रीडलैंडर ने जर्मन भाषा में भाषण दिया. 1930 के दशक में प्राग में बड़े हुए फ्रीडलैंडर की जर्मन मातृभाषा हुआ करती थी. वहां हिटलर की सेना पहुंच गई.

उनका परिवार भागकर फ्रांस गया. फ्रीडलैंडर को बचाने के लिए परिवार ने उन्हें एक कैथोलिक बोर्डिंग स्कूल में छुपा दिया. वह आखिरी मौका था जब फ्रीडलैंडर ने अपने परिवार को देखा. बच्चे को स्कूल में छुपाने के बाद माता पिता ने खुद को एक अस्पताल में छुपाने की कोशिश की.

जर्मन संसद के चैम्बर में उन पलों को याद करते हुए फ्रीडलैंडर ने कहा, “मैं स्कूल से भाग गया और अस्पताल में मैंने अपने अभिभावकों को ढूंढ लिया. उन्हें मुझे वापस भेजना पड़ा. वे कैसा महसूस कर रहे होंगे, वे देख रहे थे कि छोटा लड़का उनके साथ रहने के लिए पूरी जान लगाकर लड़ रहा था. उसे कमरे से बाहर कर दिया गया. वह हमारी आखिरी मुलाकात थी.”

फ्रीडलैंडर के परिवारजनों को 1942 में स्विस पुलिस ने सीमा पार करते हुए पकड़ लिया. फ्रीडलैंडर तब नौ साल के थे. उन्हें नाजियों ने “ट्रांसपोर्ट नंबर 40” के जरिए आउशवित्स भेज दिया.

फ्रीडलैंडर ने कहा, “मैं अकसर खुद से यही पूछता था कि क्या उन तीन दिनों की नर्क जैसी यात्रा के दौरान मेरे माता पिता साथ थे? अगर वे साथ थे तो उन्होंने एक दूसरे से क्या कहा होगा? वे क्या सोच रहे होंगे? क्या उन्हें पता था कि कौन सी चीज उनका इंतजार कर रही है?”

फ्रीडलैंडर के पिता बीमार थे. माना जाता है कि यातना केंद्र आउशवित्स में पहुंचते ही उन्हें गैस चैम्बर में डालकर मार दिया गया. उनके साथ ट्रेन में और 638 लोग थे. फ्रीडलैंडर की मां तीन महीने ज्यादा जी सकीं.

लेकिन इस दौरान उन्होंने एक गुलाम के तौर पर काम किया. ट्रांसपोर्ट 40 के जरिए ढोए गए लोगों में 200 बच्चे भी थे. 1945 में जब दूसरा विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो उनमें से सिर्फ चार जिंदा मिले.

बोर्डिंग स्कूल में छुपे रहने के दौरान फ्रीडलैंडर ने कैथोलिक ईसाई धर्म अपना लिया. 1948 में इस्राएल की स्थापना के पांच हफ्ते बाद वह वहां गए और वहीं बस गए.

बाद में वह दुनिया में होलोकॉस्ट के प्रमुख इतिहासकार बने. उनका काम इतिहास की दो किताबों में दर्ज है. पहली किताब “नाजी जर्मनी एंड द ज्यूज” 1997 में प्रकाशित हुई. दूसरी पुस्तक “द ईयर्स ऑफ एक्सटर्मिनेशन” 2007 में छपी.

साभार- ‘डी डब्ल्यू हिन्दी’



from The Siasat Daily http://bit.ly/2WNjlXY